कविता जब लिखें तो दिल और दिमाग दोनों का प्रयोग करें.
कविता लिख कर जब कविता का मूल्याङ्कन करें तो केवल हृदय का इस्तेमाल करें तथा हृदय के निर्देश अनुसार ही कविता को अंतिम रूप प्रदान करें।
------प्रभु दयाल खट्टर

Thursday, 8 October 2020

मेरे दिल के घरौंदे में आओं कभी....

 सूफियाना हुआ दिल

सूफियाना हुआ दिल मचलने लगे हम। तेरी याद में नगमे पढ़ने हम ।।
कैसे बताए क्या चाहते हम । तेरी खुशबू में जो महकने लगे हम ।। सूफियाना........
तेरे जुल्फों की घनी छांव में । दबी उंगलियों संग उलझने लगे हम।। तेरी याद में.....
मेरे दिल के घरौंदे में आओं कभी थोड़ा बहक जाऊं मैं भी तेरे आगोश में सूफियाना ......
मैं भी बंजर हूं ,बेकार सा थोड़ी उग जाओं तुम भी मौसमी पौध सी... सूफियाना ......।।

रेशमा त्रिपाठी प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
Seen by Reshma Tripathi Raj Tripathi at 9 August 2020 at 20:24

Friday, 24 July 2020

शीर्षक– ‘ ये सावन मास न छूटे '




“लगे सावन का महीना,बुझे पपीहें की प्यास,
कि कोई गीत न छूटें, ये सावन मास न रूठें ।। 

जैसे स्वाति की बूंदें के गिरते ही,बनते सीप से मोती,
वैसे ही बन जाओ तुम,मेरा प्रेम गीत मल्हार ।।

कि कोई गीत न छूटे ,ये सावन मास न रूठे ।

डाली– डाली पर झूला– झूले,छुए कदंब की डाल ।
ज्यों– ज्यों भीगे चुनर सिर की,त्यों– त्यों बढ़ें प्रेम की आग ।।

कि कोई गीत न छूटें,ये सावन मास न रुठें ।।

हरें रंग की चूड़ी खनके,हरे रंग की मेंहदी ।
जिसको देख कर चढ़ें मुझे, भोले वाली भांग ।।

कि कोई गीत न छूटें,ये सावन मास न रूठे ।।

निधिवन में जब मिलूं तुम्हें,बन जाना मेरे श्याम ।
और जब आए सावन मास,धरा पर मिलना भोलेनाथ ।।

कि कोई गीत न छूटें,ये सावन मास न रूठे ।। "

रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश

Saturday, 18 July 2020

‘गुजरी जिन्दगी '


“ जो गुजरी जिन्दगी हैं, वो ठहरी सी हैं ।
  खोजती हुई तुम्हें , आज भी यायावर सी हैं ।।

न कोई घर– बार, न कोई ठौर– ठिकाना ।
अपने में उलझी,बहती नदियों सी धारा ।।

गुमनाम होकर भी, पाला तुम्हें हैं ।
कभी रूह,कभी ख्वाबों, ख्यालों में अपने ।।

जो गुजरी जिन्दगी हैं, वो ठहरी सी हैं ।
खोजती हुई तुम्हें ,आज भी यायावर सी हैं ।।

राहों में बन गई ,तमाशा हैं वो ।
फिर भी ढूंढती, नभ के तारों में हैं ।।

चन्दा संग चलती,सूरज संग निकलती ।
ओंस की बूंदों में,संजोती हैं तुम्हें ।।

जो गुजरी जिन्दगी हैं, वो ठहरी सी हैं ।
खोजती हुई तुम्हें ,आज भी यायावर सी हैं ।।"

रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश

Thursday, 21 May 2020

शीर्षक – ‘ किताबें शक पैदा करती हैं '

शीर्षक – ‘ किताबें शक पैदा करती हैं '



“ किताबें शक पैदा करती हैं
लोगों के बीच
जिसका मकसद होता हैं
एक निपट उदासी
तब अजीब लगता हैं
उसे देखकर!
निराश होते 
किन्तु!
गहरी धुंध के बीच
बात के तह में छिपी बात
एक खेल की तरह
ये किताबें ढूंढ लेती हैं
तब लोगों के बीच
शक पैदा करती हैं ये किताबें ।
बहुतायत भीड़ से बाहर
अपने भीतर की 
तहों में कितनी दफा
हिरन की तरह चौकन्ना
ऊपर से शान्त दिखाई देती 
कितनी बार वह पत्थर की तरह कठोर
जिसमें कोई सुराग नहीं
वह एक सख्त,निर्मम आदमी की तरह
लोगों के बीच 
शक पैदा करती हैं ये किताबें।
उसमें!
कहें –अनकहें अल्फाजों से होकर गुजरती
किसी को आहत 
किसी को शान्त सरोवर में ले जाती 
तो कोई कल्पना में विचरण करता 
और कहीं कोई ज्ञान की ज्योति लिए बैठ जाता
तब भी ये किताबें शक पैदा करती
और न्याय में संशय
उपलब्धि में अहंकार
समृद्धि में स्वा की भावना 
जिज्ञासा में उम्मीद बन 
ये किताबें शक पैदा करती हैं
लोगों के बीच ।। "

रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।

Sunday, 16 February 2020

“ वसन्त ऋतु में !



“ वसन्त ऋतु में !
यूं धीरे– धीरे सदियों का सर्दियों का जाना, 
    गुनगुनी धूप का आना
    सूखे पत्तों का झड़ना 
    नए पत्तों का सृजन होना
   सरसों के फूलों की सुगंध में
प्रकृति स्वयं को अपने रंगो में घोलती
                     उस रंगों की गुदगुदाहट में 
                      गेहूं की बालियों का आना 
                         किसानों का प्रफुल्लित मन
                     देखकर लगता हैं मानो!
                 कोई  युवती अठारह बरस की हुईं हैं।
                   यह मोहक छवि
              अम्बर तक फैली धानी चूनर सी लगती हैं ।।"

वसन्त ऋतु एवम् वसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं आप सभी को ।
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।

Saturday, 4 January 2020

शीर्षक– ‘जन्मदिन तुम्हारा'



“ जन्मदिन हैं तुम्हारा, यह मेरा पैगाम हैं तुमको
  जीना जिंदगी अपनी, सब कुछ भूल कर के तुम ।

अपने अरमानों को पूरा करना, हौंसलों से तुम
 सब कुछ भूल करके, एक नई शुरुआत करना तुम ।

 अनुभव के ज्ञान से , निष्कर्ष पर पहुचना तुम
 ज़िन्दगी का हर एहसास अपनी दृष्टि  से देखना तुम ।

ओंस की बूंदों के जैसें, तुम ही गिरना ,तुम संभालना,
अपनी ही चेतना से तुमसब कुछ भूल कर के एक नई शुरुआत करना तुम ।

अब तक जो बितायी ज़िन्दगी, उसे याद रखना तुम 
किन्तु खुद को मत मिटाना, यह सदैव याद रखना तुम ।

 किसी के यादों में ,बातों में, नजरों में, अब उठने की कोशिश मत करना तुम 
छोड़ दो रूठना, मनाना, जताना, अग्नि परीक्षा देना तुम ।

ज़िन्दगी एक सफर हैं ,अब किसी के लिए रुकना नहीं तुम
 सब कुछ भूल कर, एक नई शुरुआत करना तुम ।

जन्मदिन तुम्हारा हैं यह मेरा पैंगाम हैं तुमको 
जीना ज़िन्दगी अपनी, सब कुछ भूल कर के तुम ।।

रेशमा त्रिपाठी 
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।

Friday, 6 December 2019

शीर्षक– ‘आज दिल मुस्कुराने को कह रहा है'


“आज न जाने क्यों?
 आज दिल मुस्कुराने को कह रहा हैं
किसी ने कोई तोहफा न दिया हैं 
न पीठ थपथपाई हैं 
फिर भी न जाने क्यों ?
आज दिल मुस्कुराने को कह रहा हैं

 कोई हसरत न पूरी हुई हैं
 न कोई अच्छा ख्वाब देखा हैं
 फिर भी न जाने क्यों ?
 आसमा में उड़ने का दिल कर रहा हैं
 गम भी वही हैं 
तन्हाई भी वही हैं
 अपनों से मिले तिरस्कार की टीस भी वही हैं
 समाज के दोगले चेहरों की बात भी वही हैं 
फिर भी ना जाने क्यों ?
आज दिल मुस्कुराने को कह रहा हैं 

कई बार खुद को रोका मुस्कुराने से 
फिर भी मुस्कान आ ही गई होठों पर 
बहुत देर बाद समझ आया 
यह न्यूज़ चैनल के सुर्खियों से आई न्यूज की थी (हैदराबाद)
जो दुःख की घड़ी में भी 
 हर स्त्री के होठों पर मुस्कान की लालिमा बिखेर गई
शायद 
इसलिए आज दिल मुस्कुराने को कह रहा हैं 
खुले आसमान में उड़ने को कह रहा हैं ....।।"

रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
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