कविता जब लिखें तो दिल और दिमाग दोनों का प्रयोग करें.
कविता लिख कर जब कविता का मूल्याङ्कन करें तो केवल हृदय का इस्तेमाल करें तथा हृदय के निर्देश अनुसार ही कविता को अंतिम रूप प्रदान करें।
------प्रभु दयाल खट्टर

Wednesday, 9 October 2019

शीर्षक– ‘कॄपा करों तुम हे प्रभु वर'


  • "मन में हो उदासी तो ,खुशियों के दीप नहीं जलते
     हो पूनम की रात, तो अंधकार नहीं रुकते 
    आज धरा की चाहत हैं, मेहनत और संघर्षों की
    हर  मानव में दृश्य दिखें, मानवता के माला की
     ऐसी कृपा करो तुम हे! प्रभुवर । 

    उड़ जाए खग के जैंसें, मानव के अहंकार
     राग द्वेष सब दूर उड़े, जैसें हो कोई पवन बहार
     हर बाला विदुषी बन सोचे, जैसें माॅ॑ वीणा की झंकार
     हर निर्बल को सबल बनाएं, ऐसे बहें करुणा की धार
     सब समुद्र के जैसें धैर्यं धरें, ऐसी करो कृपा तुम हे ! प्रभुवर।

    आधार किसी का ना लुट जाए, भाग्य किसी का न फूट जाए 
    कोई भी स्त्री बांझ न हो, किसी की ममता अनाथ ना हो
     किसी स्त्री में दामन दाग न हो, कोई शिशु न मचले दूध बिना
     कोई पुरुष रहे न प्रेम बिना, किसी स्त्री का श्रृंगार न छूटे
     किसी नयन में सरयू तट के जैंसा नीर न हो ऐसी कृपा करों तुम हे! प्रभूवर।।"  

    लेखिका– रेशमा त्रिपाठी 
    प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
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