- "मन में हो उदासी तो ,खुशियों के दीप नहीं जलतेहो पूनम की रात, तो अंधकार नहीं रुकतेआज धरा की चाहत हैं, मेहनत और संघर्षों कीहर मानव में दृश्य दिखें, मानवता के माला कीउड़ जाए खग के जैंसें, मानव के अहंकारराग द्वेष सब दूर उड़े, जैसें हो कोई पवन बहारहर बाला विदुषी बन सोचे, जैसें माॅ॑ वीणा की झंकारहर निर्बल को सबल बनाएं, ऐसे बहें करुणा की धारसब समुद्र के जैसें धैर्यं धरें, ऐसी करो कृपा तुम हे ! प्रभुवर।आधार किसी का ना लुट जाए, भाग्य किसी का न फूट जाएकोई भी स्त्री बांझ न हो, किसी की ममता अनाथ ना होकिसी स्त्री में दामन दाग न हो, कोई शिशु न मचले दूध बिनाकोई पुरुष रहे न प्रेम बिना, किसी स्त्री का श्रृंगार न छूटेकिसी नयन में सरयू तट के जैंसा नीर न हो ऐसी कृपा करों तुम हे! प्रभूवर।।"लेखिका– रेशमा त्रिपाठीप्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
हिंदी साहित्य में वर्तमान काल की सबसे बड़ी विडम्बना ये है ,कि कविता के रचना विकास की गति नगण्य सी हो रही है. कविता लेखन हेतु जहाँ कवियों में रूचि का अभाव है , वहीं काव्य पुस्तकों के प्रकाशन हेतु प्रकाशकों में भी उत्साह लुप्त सा हो गया है , इस ब्लॉग के माध्यम से प्रयास है कि नवोदित कवियों को आगे लाया जाये,उन्हें प्रकाशित करके प्रोत्साहित किया। इस पावन कार्य में सभी का सहयोग और शुभकामनायें अपेक्षित हैं ताकि कविता पुनर्जीवित हो सके। धन्यवाद,
कविता जब लिखें तो दिल और दिमाग दोनों का प्रयोग करें.
कविता लिख कर जब कविता का मूल्याङ्कन करें तो केवल हृदय का इस्तेमाल करें तथा हृदय के निर्देश अनुसार ही कविता को अंतिम रूप प्रदान करें।
------प्रभु दयाल खट्टर
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