“तेरे यादों के अल्हड़पन में
धुंधली रेखाऐं छाई हैं
यादों के उस पल में अब
हृदय भी रुक-रुक कर चमके हैं
जैसें हो इंद्रधनुष का रंग कोई,
नींदों में अब मेरे तेरा स्वप्न नहीं आता
बस कुछ बुदबुदाहट के स्वर आते
अब वह उन्माद प्रलय नहीं आता
बस धीमा सा स्पंदन तेरा रूह को छू जाता
अब मानों! जीवन की नीरसता ही
लघु कंपन लेकर आई हैं,
मधु प्रभात का पता नहीं
किन्तु
तेरे यादों के सुखमय पल में अब
थोड़ी धुंधलाहट की स्मृति छाई हैं।
लगता हैं
इस करुणामय ह्रदय में अब
थोड़ी –थोड़ी सी तरुणाई आई हैं
क्योंकि ?
तेरे यादों के अल्हड़पन में
थोड़ी –थोड़ी धुधली रेखाऐं छाई है।।"
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।
