शीर्षक – ‘ किताबें शक पैदा करती हैं '
“ किताबें शक पैदा करती हैं
लोगों के बीच
जिसका मकसद होता हैं
एक निपट उदासी
तब अजीब लगता हैं
उसे देखकर!
निराश होते
किन्तु!
गहरी धुंध के बीच
बात के तह में छिपी बात
एक खेल की तरह
ये किताबें ढूंढ लेती हैं
तब लोगों के बीच
शक पैदा करती हैं ये किताबें ।
बहुतायत भीड़ से बाहर
अपने भीतर की
तहों में कितनी दफा
हिरन की तरह चौकन्ना
ऊपर से शान्त दिखाई देती
कितनी बार वह पत्थर की तरह कठोर
जिसमें कोई सुराग नहीं
वह एक सख्त,निर्मम आदमी की तरह
लोगों के बीच
शक पैदा करती हैं ये किताबें।
उसमें!
कहें –अनकहें अल्फाजों से होकर गुजरती
किसी को आहत
किसी को शान्त सरोवर में ले जाती
तो कोई कल्पना में विचरण करता
और कहीं कोई ज्ञान की ज्योति लिए बैठ जाता
तब भी ये किताबें शक पैदा करती
और न्याय में संशय
उपलब्धि में अहंकार
समृद्धि में स्वा की भावना
जिज्ञासा में उम्मीद बन
ये किताबें शक पैदा करती हैं
लोगों के बीच ।। "
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।
