“ जो गुजरी जिन्दगी हैं, वो ठहरी सी हैं ।
खोजती हुई तुम्हें , आज भी यायावर सी हैं ।।
न कोई घर– बार, न कोई ठौर– ठिकाना ।
अपने में उलझी,बहती नदियों सी धारा ।।
गुमनाम होकर भी, पाला तुम्हें हैं ।
कभी रूह,कभी ख्वाबों, ख्यालों में अपने ।।
जो गुजरी जिन्दगी हैं, वो ठहरी सी हैं ।
खोजती हुई तुम्हें ,आज भी यायावर सी हैं ।।
राहों में बन गई ,तमाशा हैं वो ।
फिर भी ढूंढती, नभ के तारों में हैं ।।
चन्दा संग चलती,सूरज संग निकलती ।
ओंस की बूंदों में,संजोती हैं तुम्हें ।।
जो गुजरी जिन्दगी हैं, वो ठहरी सी हैं ।
खोजती हुई तुम्हें ,आज भी यायावर सी हैं ।।"
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
