मुझे वहां जाना है ...
जब से बड़ी हुई हूँ
एक पैर पर खड़ी हुई हूँ. हाथ उठाकर ,
दरवाजा खोलो
खोलो खिड़कियां ,कब तक
खड़ी रहूंगी ?
पैर सिर्फ खड़ा होने के लिए नहीं,
ये चलने के लिए हैं
इन्हे चलने दो।
ईश्वर के लिए चलने दो इन्हें वहां तलक
जहाँ आसमान धरती से मिलता है,
जहाँ समुद्र में नदी का
जल मिलता है
जहाँ होता है सूर्योदय उदास
आँखों में,
------- मुझे वहां जाना है।
स्वाति बेनीवाल
२३ वर्ष
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