कविता का शीर्षक –‘मनुष्य’
मनुष्य हैं मनुष्य....कोई देव तो नहीं ,
मिथ्या न करें रोष वो,
मिथ्या न करें घोष वो,
ना ही कोई वृत्त वो ..
ना ही कोई चातक,
मनुष्य है मनुष्य .....कोई देव तो नहीं।
खुशबू तो.. खुशबू है
कोई फूल तो नहीं,
उसमें लोभ है ,...प्रेम है
किन्तु ... कोई -
त्याग भाव ...तो नहीं ,
मनुष्य है मनुष्य कोई देव तो नहीं ।
वह कुबेर भी नहीं ,
हरिशचन्द्र भी नहीं .
ना ही चित्त शांत .... उसका ,
वह कोई अक्षय कोष तो नहीं
न करें सन्तोष तो..
इसमें कोई दोष तो नहीं.
मनुष्य है मनुष्य ...कोई देव तो नहीं।।"
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
मनुष्य हैं मनुष्य....कोई देव तो नहीं ,
मिथ्या न करें रोष वो,
मिथ्या न करें घोष वो,
ना ही कोई वृत्त वो ..
ना ही कोई चातक,
मनुष्य है मनुष्य .....कोई देव तो नहीं।
खुशबू तो.. खुशबू है
कोई फूल तो नहीं,
उसमें लोभ है ,...प्रेम है
किन्तु ... कोई -
त्याग भाव ...तो नहीं ,
मनुष्य है मनुष्य कोई देव तो नहीं ।
वह कुबेर भी नहीं ,
हरिशचन्द्र भी नहीं .
ना ही चित्त शांत .... उसका ,
वह कोई अक्षय कोष तो नहीं
न करें सन्तोष तो..
इसमें कोई दोष तो नहीं.
मनुष्य है मनुष्य ...कोई देव तो नहीं।।"
रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश
