कविता - गाय
गाय को सड़कों पर
मारा मारा देखता हूँ
तो सोचता हूँ
तैंतीस करोड़ देवताओं को
वास देने वाली स्वयं निराश्रित है ,
भूखी है
असुरक्षित है
पीड़ित है ,
तब अवाक रह जाता हूँ...
किकर्तव्यविमूढ़ सा
खड़ा मैं ......
कवि राजेश सोलंकी
22 वर्ष ,आगरा
गाय को सड़कों पर
मारा मारा देखता हूँ
तो सोचता हूँ
तैंतीस करोड़ देवताओं को
वास देने वाली स्वयं निराश्रित है ,
भूखी है
असुरक्षित है
पीड़ित है ,
तब अवाक रह जाता हूँ...
किकर्तव्यविमूढ़ सा
खड़ा मैं ......
कवि राजेश सोलंकी
22 वर्ष ,आगरा