"अपनी ही छवि में ‘मै’हैं लीन
‘ मैं’ है निजता का पोषक
वाणी एक हैं सीख बनी
अपने ही ‘मैं’में लीन सभी
चाटुकता के सब रचनाकार
समझ नहीं हैं गूढ़ भेद की
सभी अहम के हैं गुरुवर
स्वा सिद्धि की शिला लिए
सब याचक,साधक बन बैठे
लिए सभी अपना हृदय कठोर
हाय!हाय में सब हैं डूबे
अपनी हार को किस्मत कहते
किन्तु भाग्य का अमृत हैं पीते
छिपा सभी अपने अश्रुओं को
हैं एक दूजे के अश्नु को पीते
नहीं नहीं मानवता आज
नहीं रहा वह प्रेम भाव
सभी हैं कोरे किन्तु लबालब
बने सभी नाविक हैं आज
किन्तु घर लौटे भिक्षुक जैसे
ऐसे सभी हैं "मैं"में जकड़े आज ।"
लेखिका –रेशमा त्रिपाठी
प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश।
